नाग जियत रहैं, त खेत जियत रहैं।”
बुंदेलखंड की ये कहावत
सदियों के लोक-अनुभव से निकली एक ऐसी समझ है, जिसमें खेती, प्रकृति और इंसान—
तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं।
जिस जीव को देखकर आज भी कई लोग डरकर अपना रास्ता बदल लेते हैं
उसी के आगे नाग पंचमी पर हाथ क्यों जोड़े जाते हैं?
इसका जवाब सिर्फ़ पुराणों में नहीं…
सावन की पहली बारिश में भी छिपा है।
खरीफ़ की बुआई के बाद जब लगातार बारिश होती है,
तो सांप सहित अन्य जीवों के बिलों में पानी भरने लगता है।
कारणवश, इस मौसम में खेतों में चूहों की संख्या भी बढ़ने लगती है।
ऐसे में साँप…
खेतों में बढ़ते चूहों का शिकार करके
फसल को बचाने
और ecology यानि पारिस्थितिकी के संतुलन को बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाते हैं।
यानी जिसे हम डर की नज़र से देखते हैं…
वही खेत का एक अनदेखा पहरेदार भी है!
लेकिन नाग के प्रति यह सम्मान
केवल प्रकृति के अनुभव से नहीं आया।
भारतीय परंपरा ने इसे अपनी कथाओं में भी जगह दी।
महाभारत के आस्तिक पर्व में
राजा परीक्षित की मृत्यु के बाद उनके पुत्र जनमेजय प्रतिशोध में सर्प-सत्र यज्ञ करते हैं—जिसका उद्देश्य था – नागों का विनाश
आस्तिक मुनि उस यज्ञ को रुकवाते हैं और साफ संदेश देते हैं कि
एक के अपराध के लिए पूरी प्रजाति को दंडित नहीं किया जा सकता।
ठीक इसी तरह, श्रीकृष्ण तथा कालिया नाग का प्रसंग भी प्रकृति के साथ मनुष्य के रिश्ते की एक दूसरी तस्वीर सामने रखता है ……
प्रकृति को मिटाना नहीं, उसके साथ संतुलन बनाना ही स्थायी समाधान है।
यही सोच धीरे-धीरे लोकजीवन का हिस्सा बन गई।
झाँसी के प्रसिद्ध खाती बाबा मंदिर पर नाग पंचमी का मेला इसका जीवंत उदाहरण है।
यहाँ नाग पूजा के साथ दंगल सजते हैं, अखाड़ों की परंपरा जीवित रहती है और ढाक-गोटों की लोकध्वनियाँ सावन के उत्सव में घुल जाती हैं।
महोबा, बाँदा, चित्रकूट से लेकर पन्ना तक—
लोक परंपराएँ भले अलग-अलग हों, लेकिन इनके भीतर एक भाव बार-बार दिखाई देता है—
मनुष्य अकेला नहीं है।
वह प्रकृति के एक बड़े तंत्र का हिस्सा है।
और दिलचस्प बात ये है कि आज का विज्ञान भी इस रिश्ते को एक नए ढंग से समझाता है।
साँप food chain का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
वे चूहों की आबादी को नियंत्रित करने में मदद करते हैं और इस तरह
कृषि पारिस्थितिकी में भी भूमिका निभाते हैं।
भारत में साँपों की सैकड़ों प्रजातियाँ पाई जाती हैं,
जिनमें बड़ी संख्या विषहीन प्रजातियों की है।
वहीं कुछ विषैले साँपों के विष से प्राप्त
वैज्ञानिक ज्ञान ने एंटी-वेनम जैसी जीवनरक्षक दवाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।बदलते परिवेश में आज कानून भी इनके संरक्षण की ज़िम्मेदारी तय करता है।
Wildlife Protection Act, 1972 के तहत संरक्षित वन्यजीवों को पकड़ना, रखना या उनका प्रदर्शन करना गंभीर कानूनी अपराध हो सकता है।
इसलिए नाग पंचमी को सिर्फ़ एक जीव की पूजा का पर्व समझना शायद इस परंपरा को बहुत छोटा कर देना होगा।
ये उस सभ्यता की स्मृति है…
जिसने प्रकृति को जीतने से पहले,
उसके साथ जीना सीखा।